भगवद गीता के अध्याय 4, श्लोक 7 में यदा यदा हि धर्मस्य मंत्र का वर्णन किया गया है। यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश का हिस्सा है और धर्म की रक्षा का उपदेश देता है। माना जाता है की जब अर्जुन ने मोह और सांसारिक माया में आकर युद्ध लड़ने से मना कर दिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा, परमात्मा एवं इस ब्रह्मांड से जुड़े बेहद ही गोपनीय और महत्वपूर्ण गीता का ज्ञान दिया।
यदा यदा हि धर्मस्य मंत्र हिंदी में । Yada Yada hi Dharmasya Mantra in Hindi
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
यदा यदा हि धर्मस्य मंत्र का विवरण :
भगवान श्री कृष्ण ने इस श्लोक के माध्यम से कहा की “जब भी इस पृथ्वी पर अधर्म का राज बढ़ता है तब-तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ। सज्जनों और साधुओं की रक्षा करने लिए और पृथ्वी पर से पाप को नष्ट करने के लिए और इस संसार में धर्म की स्थापना करने के लिए मैं इस संसार में अवतार लेता हूँ।” श्रीमद्भागवत गीता में इस श्लोक का वर्णन किया गया है और बताया गया है की उन्होंने यह अपने मुख से कहा है।
भगवान श्री कृष्ण का यह मंत्र धर्म और अधर्म की संघर्ष और उनके चक्रव्यूह की व्याख्या करता है। यह मनुष्य को धर्म की प्राथमिकता के बारे में बताता है और संसार की मोह माया से दूर करता है। साथ ही यह मंत्र व्यक्ति के भीतर धर्मपरायणता और समर्पण की भावना को प्रोत्साहित करता है। इस मंत्र का पाठ व्यक्ति को सत्य, न्याय, और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।








